मोरबी ब्रिज मामले में ओरेवा ग्रुप के प्रमोटर जयसुख पटेल ने किया सरेंडर

मोरबी ब्रिज हादसा मामले में ओरेवा ग्रुप के जयसुख पटेल ने आत्मसमर्पण कर दिया है। जयसुख पटेल ने मोरबी में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में सरेंडर किया। मालूम हो कि राजकोट पुलिस की ओर से ओरेवा समूह के प्रमोटर जयसुख पटेल के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी किया था। एक मजिस्ट्रेट अदालत ने भी पटेल के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। सनद रहे हाल ही में हाल ही में पुलिस ने इस मामले में आरोप पत्र दाखिल किया था। आरोप पत्र में ओरेवा समूह के प्रबंध निदेशक जयसुख पटेल का नाम 10वें आरोपी के तौर पर शामिल किया गया है। नौ आरोपी पहले ही गिरफ्तार किए जा चुके हैं।

मालूम हो कि मोरबी में मच्छू नदी पर बने ब्रिटिश काल का झूला पुल पिछले साल 30 अक्टूबर को टूट गया था। इस पुल के संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी अजंता मैन्युफैक्चरिंग लिमिटेड ओरेवा समूह के पास थी। बताया जाता है कि पुल मरम्मत के कुछ दिन बाद ही टूट गया था। इस मामले में पुलिस ने मोरबी के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट एमजे खान की अदालत में 1,200 से ज्यादा पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है। पुलिस उपाधीक्षक पीएस जाला के नेतृत्व में आरोप पत्र तैयार किया गया था। जाला मामले के जांच अधिकारी हैं।

सनद रहे ओरेवा समूह के प्रमोटर जयसुख पटेल का नाम पुलिस ने प्राथमिकी में शुरुआत में दर्ज नहीं किया गया था। हालांकि पुलिस की चार्जशीट में उन्हें 10वां आरोपी बनाया है। आरोप पत्र में 300 से अधिक गवाहों के बयान दर्ज किए गए हैं। हादसे के बाद पुलिस ने ओरेवा समूह के दो प्रबंधकों, दो टिकट कलर्क समेत नौ आरोपियों को गिरफ्तार किया था। गौर करने वाली बात यह भी कि गिरफ्तारी वारंट से बचने के लिए ओरेवा समूह के प्रबंध निदेशक पटेल की ओर से अग्रिम जमानत याचिका भी लगाई गई थी। इस याचिका पर पहली फरवरी को सुनवाई होनी थी।

एक महत्वपूर्ण बात यह भी हाल ही में इस मामले में गुजरात उच्च न्यायालय में सुनवाई हुई थी। इस सुनवाई के दौरान ओरेवा समूह ने पीड़ितों को मुआवजा देने की पेशकश की थी। लेकिन, उच्च न्यायालय ने साफ कर दिया था कि मुआवजे की पेशकश करने से आरोपी किसी जवाबदेही से बच नहीं सकते हैं। पटेल समेत सभी 10 आरोपियों पर आईपीसी की धारा 304 (गैर इरादतन हत्या), 337 (उतावलापन या लापरवाही वाला कृत्य करके किसी भी व्यक्ति को चोट पहुंचाना), 308 (गैर इरादतन हत्या का प्रयास), 336 (मानव जीवन को खतरे में डालने वाला कार्य) और 338 (उतावलेपन या लापरवाही से कार्य करके गंभीर चोट पहुंचाना) जैसी धाराओं के तहत केस दर्ज हैं।

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