कितना अमीर जो रात से मेरे घर बैठा है। कह रहा उसके आँखों में रोशनी भर दूं।।


धार…एक अभियान/नवीन श्रीवास्तव वरिष्ठ पत्रकार,लेखक,बस्तर
रोशनी करने के लिए जिनके लिए दिये काफी होते हैं उन्हें अपने धड़कते सीने से पूछना चाहिए कि क्या ..सचमुच यह काफी है ..क्या सचमुच हम दीया जला अंदर या बाहर रोशनी कर सारा अंधेरा दूर कर सकते हैं ..शायद नहीं अगर ऐसा होता तो आज लाखों-करोड़ों चेहरे में उदासी की झुर्रियां क्यों परछाई बन उभर आती ..अगर रोशनी करने मात्र से खुशियां आती तो गांव से ज्यादा शहर में लोग चमक दमक के बीच खुश होते ..मतलब केवल दीया जलाकर उजाला बांटने का जश्न ..नहीं मनाया जा सकता .. उस दिए की उदासी किसी ने कभी नहीं पूछा- जिस के ठीक नीचे अंधेरा होता है जो हमेशा यह एहसास दिलाते रहता है की दीया जलकर कहीं यह ना सोचने लगे कि .. सारी दुनिया में रोशनी हो रही है.. और ..जलने का मर्म तो दिये से कहीं ज्यादा उस बाती को है जो रोशनी की खातिर अपने वजूद तक को खाक कर देता है ..पर..पर होता क्या है.. शाबाशी हमेशा दीया ही लूट ले जाता है …देश की व्यवस्था को ही देख लीजिए यहां जो शान्ति,सुकून है ..वह मात्र किसी सरकार,व्यवस्था सत्ता . बाजार, धन या अमीरजादों या किसी योजना से है नहीं है ..बल्कि पूरी धरतीपटल में श्रेष्ठ देश के महान विरासत से प्राप्त ज्ञान, आध्यात्मिक शक्तियों,लाखों – करोड़ों ईमानदार और मेहनत करने वालों की वजह से है सनातन काल से दीप्त जलते आ रहे इसी के रोशनी को ..मशाल में तब्दील करना है ..अगर कभी यह नहीं रहे तो सब खत्म हो चलेगा पर इसके लिए हम ….बाती से कुछ सीख ले इस तरह की उजाले के लिए कहीं रोशनी के लिए खुद को जला सके आजकल नाकामी और कमजोरियों से मुंह चुराने एक परंपरा चल पड़ी है जश्न और उत्सव का रस्म अदा कर हम संतुष्ट हो जाना चाहते हैं.. पर चारों तरफ असमानता है , हिंसा, असन्तुष्टि है ,
कहीं रिश्ते टूटने का अंधेरा है,कहीं नाकामी,कहीं बीमारी ,सुख को बाजारू उत्पाद में बदला जा मतलब टेटि गर्म है तो खरीद लो वरना..अंदर का अंधेरा है कि दूर नही हो रहा.जरूरत है कि जश्न को जीवन मे शामिल करें ..मिलकर कुछ ऐसा करें कि अंदर भी दिया जल उठे..इस उजाले से आंनदित हम खुद ही बांटने निकल पड़े सबको मुट्ठी-मुट्ठी भर उजाला..दीपावली की हार्दिक बधाइयां एवं शुभकामनाएं..(फिर मिलता हूं)



