कोरोना से उबरे लोग बन रहे मानसिक रोग का शिकार

एक नए अध्ययन में सामने आया है कि कोरोना संक्रमण से ठीक हो चुके लोगों में से एक तिहाई में तीन से छह महीने के भीतर कई प्रकार की मानसिक समस्याएं देखने को मिल रही हैं।
ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 2,30,000 लोगों परअध्ययन किया, जो संक्रमण से ठीक हुए थे। उन्होंने पाया कि हर तीन में से एक ठीक हुए रोगी को छह महीने के भीतर मनोरोग की स्थिति से जूझना पड़ा। शोधकर्ताओं का कहना है कि कोरोना लोगों को मानसिक रोगी बना रहा है।  

कई तरह के मानसिक रोगों के लक्षण देखे गए: हालांकि विश्लेषण करने वाले शोधकर्ताओं ने जानकारी देते हुए कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि कोविड-19 वायरस को मनोरोग स्थितियों जैसे कि चिंता और अवसाद से कैसे जोड़ा गया, लेकिन प्रतिभागियों में इस तक के कुल 14 मानसिक रोगों से संबंधित लक्षण देखे गए और उनका निदान किया गया। 

इस दिशा में अभी और शोध करने की जरूरत: ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के मनोचिकित्सक मैक्स टक्वेट ने कहा कि हमारे परिणाम बताते हैं कि कोविड-19 संक्रमण के बाद मस्तिष्क संबंधी रोग फ्लू के अन्य श्वसन संक्रमणों के बाद सबसे अधिक आम हैं। उन्होंने कहा कि इस दिशा में और शोध करने की जरूरत है। ऑक्सफोर्ड के एक मनोचिकित्सक प्रोफेसर, पॉल हैरिसन ने कहा कि अधिकांश मानसिक विकारों के लिए अलग-अलग और छोटे जोखिम हैं, लेकिन पूरी आबादी में इसका प्रभाव काफी हो सकता है। 

बढ़ते मामलों को लेकर विशेषज्ञ चिंतित : गंभीर संक्रमण से ठीक हुए लोगों में मस्तिष्क विकारों के जोखिमों के प्रमाण से स्वास्थ्य विशेषज्ञ चिंतित हैं। पिछले साल शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया था कि कोविड-19 से बचे 20 फीसदी लोगों में तीन महीने के भीतर एक मनोरोग समस्या का पता चला था।

शोधकर्ताओं ने इस तरह किया अध्ययन 
यह अध्ययन लांसेट साइकाइट्री जर्नल में प्रकाशित हुआ है। इसमें शोधकर्ताओं ने 236,379 कोविड-19 रोगियों के स्वास्थ्य रिकॉर्ड का विश्लेषण किया। पाया गया कि 34 फीसदी प्रतिभागियों में कोरोना संक्रमण से पूरी तरह ठीक होने छह महीने के बाद न्यूरोलॉजिकल बीमारियों का पता चला था।  इनमें 17 फीसदी प्रतिभागियों में चिंता देखी गई, वहीं खराब मूड से संबंधित प्रतिभागियों की संख्या 14 फीसदी थी।

इसके अलावा गंभीर रोगियों, जिन्हें गंभीर कोरोना संक्रमण की स्थिति में आईसीयू में भर्ती कराया गया था उनमें से 7 फीसदी में छह महीने के भीतर स्ट्रोक और लगभग 2 फीसदी में डिमेंशिया की समस्या देखने को मिली।

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