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परिस्थितियों के प्रयोगशाला से निकली है… ” कर्ण हूं मैं “

 

रचना संग्रह: शीर्षक –

मैं कर्ण हूं (काव्य संग्रह)

कवि/रचना – पवन प्रेमी

प्रकाशक लक्ष्मी प्रकाशन, दिल्ली

मूल्य – 175 /-

 

मानवीय संवेदनाओं की खुशबू लिए प्रेरक गुलदस्ता है यह कविता संग्रह..

 

फूलों का गुलदस्ता सौंदर्य के लिए होता है पर “कर्ण हूं मैं” कविता संग्रह एक ऐसा गुलदस्ता है जिसमें मानवीय संवेदनाओं की खुशबू है.. इसे पढ़कर बहुमुखी प्रतिभा लिए कवि पवन प्रेमी अपने नाम के अनुरूप निरंतर बहने , गतिमान रहने में ही जीवन की सार्थकता को देखते हैं अगर यह कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी इस कविता संग्रह के मुख पृष्ठ में प्रकाशित चार पंक्तियों से रचनाकार का परिचय स्वयं ही हो जाता है जिसमें वे लिखते हैं-

हार नहीं सकता मैं

भाग नहीं सकता मैं

रण मेरा भाग्य बना

कर्ण हूं मैं…..

 

हालांकि अपनी बात को स्पष्ट करते हुए रचनाकार कहते हैं कि हृदय के करीब ऐसे चरित्रों का चित्रण इस संग्रह में है जो अपने कार्य क्षेत्र में कर्ण की भांति संघर्ष कर अपना अस्तित्व ढूंढते रहते हैं ,आप उनकी रचना को पढ़ते हुए आगे बढ़े तो यह स्वयं स्पष्ट हो जाता है उनके अंदर संवेदनाओं को सहेजने अणुओं का ऐसा प्रस्फुटन हो रहा है जिसे सहेजते से वे “कर्ण “जैसे योद्धा ही प्रतीत होते हैं ..! अपनी पहली कविता “कवि मन” की बात कहते हैं

आंदोलित रहता सदा,

हृदय की उबाल को,

परोसना चाहता स्याही कलम से ।चाहता है बहुत कुछ कहना कवि मन।

 

…इन पंक्तियों से बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता है धीरे-धीरे पाठक आगे बढ़ते हैं आगे के सफर में रचनात्मक चित्रण के साथ शब्द और गहरी संभावनाओं के पंख लिए बढ़ते चले जाते हैं – शीर्षक रचना कर्ण हूं मैं में आप पढ़ेंगे कि जितनी सरलता से महाभारत के महती किरदार कर्ण को शुरुआती चंद लाइनों में रचनाकार जीवंत कर देते हैं वह अद्भुत है –

सूर्य की लाली से

उत्पन्न लाल मैं,

 

दिव्या कुंडला धारी हूं

रिपु दलन काल हूं ।..

 

आगे लिखते हैं उससे कर्ण का अंतर्द्वंद्व जीवंत हो जाता –

हार नहीं सकता मैं

भाग नहीं सकता मैं

रण मेरा भाग्य है बना

कर्ण हूं मैं

 

परंतु इस कविता के साथ रचनाओं में मात्राओं की कुछ तकनीकी त्रुटियां चुभती है जो अच्छी कविताओं और भाव को अभिव्यक्त होने के के रास्ते पर कांटे बिछाते से लगते हैं यह सब एक तरह के अवरोध के साथ अखरती है भाव पक्ष के साथ तकनीकी पक्ष कविताओं को जीवंत करने बेहद जरूरी होते है क्योंकि रचना तैयार हो जाने पर मुद्रित अवस्था में आप कुछ नहीं कर सकते।

 

 

बहरहाल आगे बढ़ते हैं… रेत की सलवटें, चेहरा देखा सभी ने पढ़ा नहीं, अंदर से बहती नदिया ,चार पैर वाली खटिया ,नदी के उस किनारे गांव जैसे गहरे कविताओं की श्रृंखला है …जिसमें कवि-कभी रेत के सलवटों के पीछे का राज दार्शनिक ढंग से खोलते हैं , कभी गरीबों के गरीबी की विडंबना को सामने रखते हैं तो कहीं लिखते हैं

 

… मानव मन नदी सामान

बाहर स्वच्छ अंदर गाद से भरा।

 

… लिखकर नदी और मानव के अंतर्द्वंद्व की तस्वीर खींचते हैं।

 

“महुये की फुल” हर हालत पर जिंदा रखने की जिद लिए कविता “मैं फिर आऊंगा” और मानव मस्तिष्क के असीम संभावनाओं को खंगालने आओ शोध करें … कविता “सीधा बोलूं तो उल्टा समझना” को लेकर मैं कवि को दो पंक्तियां अपनी डायरी से समर्पित करना चाहता हूं –

जो दिखता नहीं वह आया है।

वह कैसा दिखता है मुझे बताना ।।

 

खिड़की से आती रोशनी ,जीत रहा मैं, लटकती तुमा …कविताओं के साथ “एक सकरी रास्ता वाला वाली घर ” में वे यह लिखते हुए –

शुरुआत ही अंत है

और अंत शुरुआत है।

 

पंक्तियों से बहुत ही मार्मिक ढंग से रेड लाइट एरिया में जीने को विवश जिंदगी से जुड़े यथार्थ को सरलता से स्पष्ट कर देते हैं ।

 

इस कविता संग्रह में कल 40 कविताएं हैं कवि का विषय भले आम हो जैसे नदी, महुआ, झरना ,घर, तुमा,कनेर ,पत्ता ,खटिया सुरा… पर वे उतने ही गहरे भावपूर्ण हैं आप पाठकों को इनके साथ ही इनके रचना संग्रह में अंग्रेजी के यू – ट्यूब, कॉकपिट, प्लास्टिक सर्जरी जैसे अनेक शब्द भी मिलेंगे और अनेकों साहित्य से सहेजे शब्द भी मिलेंगे जिससे सही अंदाजा होता है कि कवि की खास शैली परिस्थितियों के प्रयोगशाला में विकसित हुई है … गंभीर भावपूर्ण विषय भी उनके रचनाओं में कम शामिल नहीं है- कर्ण हूं मैं,लक्ष्य, सीधा बोलूं तो उल्टा समझना, मैं फिर आऊंगा जैसी कविताएं प्रेरित करती है समाज के कुरीतियों खामियों को भी उजागर करते हैं .. अनेक जगहों पर ज्वार – भाटा की तरह उठते भावनाओं के बीच कवि के शब्द क्लिष्ठ हो जाते हैं…पर अक्सर इन्हीं जगहों पर कवि के शब्द सामर्थ्य आश्चर्य भी कर देते है .. संघर्ष करने के जज्बे के समर्थक हैं.. एक और खास विशेषता उनकी रचना संग्रहण योग्य बनाती है कि वे अपनी बातों को खाने किसी भी तरह के सरहद को स्वीकार नहीं करते और ना ही प्रयोग से बचने की कोशिश करते हैं .. कुल मिलाकर यह सभी बातें “कर्ण हूं मैं” को न केवल एक पीढ़ी विशेष के लिए संग्रह योग्य बनाती है बल्कि कुछ ढूंढने निकले विदुषी/विज्ञ पाठकों के लिए भी महत्वपूर्ण साबित होती है साबित … मेरी तरफ से लेखन शैली,रचनाओं के प्रयोग़ धर्मी” मैं कर्ण हूं” के रचनाकार कवि श्री पवन प्रेमी जी को अपनी शुभकामनाएं अर्पित करता हूं एवं उनके उज्ज्वल भविष्य कामना करता हूं.. बढ़ते कदमों को नित नयाआयाम मिले …।

 

समीक्षक-

नवीन श्रीवास्तव

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक,

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