भूमकाल पर केन्द्रित नाटक ‘गुण्डाधूर’ को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाये

BY-Naveen shrivastava


‘भूमकाल स्मृति-दिवस’ पर महामहिम राज्यपाल से की गयी माँग।

जगदलपुर। छत्तीसगढ़ की राज्यपाल सुश्री अनसुइया उइके ने ‘भूमकाल स्मृति-दिवस’ पर भूमकाल के नायक गुण्डाधूर की प्रतिमा पर श्रद्धासुमन अर्पित किये।इसी प्रसंग में पूर्व मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में भाजपा के जगदलपुर नगर महामंत्री संग्राम सिंह राणा और भाजपा युवा मोर्चा के कार्यकारिणी सदस्य परेश ताटी ने भोपालपटनम् (बस्तर) के प्रतिष्ठित साहित्यकार लक्ष्मीनारायण पयोधि के बहुचर्चित काव्यनाटक ‘गुण्डाधूर’ की प्रति राज्यपाल महोदया को भेंट की।
इस अवसर पर इन युवा नेताओं ने महामहिम राज्यपाल से अनुरोध किया कि सन् 1910 में ब्रिटिश हुक़ूमत द्वारा आदिवासी समुदाय के हितों पर कुठाराघात करने वाली नीतियों के विरुद्ध घटित आदिवासी महाविद्रोह के नायक धुरवा जनजाति के वीर गुण्डाधूर आदिवासी समाज के गौरव पुरुष हैं।अत: भूमकाल के कारणों और उस ऐतिहासिक क्रांति के वास्तविक ‘हीरो’ की जानकारी नयी पीढ़ी को होनी चाहिए।इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये भूमकाल पर आधारित प्रथम साहित्यिक कृति के रूप प्रतिष्ठित पयोधिजी के लोकप्रिय काव्यनाटक ‘गुण्डाधूर’ को महाविद्यालयीन पाठ्यक्रम में शामिल किये जाने संबंधी निर्देश देने का कष्ट करें।
उल्लेखनीय है कि भूमकाल पर शोधपरक काव्यनाटक की रचना प्रख्यात साहित्यकार लक्ष्मीनारायण पयोधि द्वारा 1982 में अपने गृहनगर भोपालपटनम् (बीजापुर) में की गयी थी,जो 1984 में ‘दण्डकारण्य समाचार’ में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुआ।रायपुर के प्रसिद्ध रंगकर्मी स्व.हरि नायडू द्वारा नवंबर 1987 में इसका महानाट्य के रूप में पहला भव्य मंचन जगदलपुर में,फिर मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग द्वारा रायपुर में आयोजित ‘जगार 88’ में किया गया।इसकी लोकप्रियता को देखते हुए ज़िला प्रशासन के सहयोग से बस्तर संभाग के तहसील मुख्यालयों में इस नाटक का मंचन किया गया।आकाशवाणी,जगदलपुर द्वारा स्थानीय और आकाशवाणी, रायपुर द्वारा इसका अखिल भारतीय प्रसारण भी किया गया।बाद में इस बहु चर्चित काव्यनाटक पर आधारित डाक्यूड्रामा का निर्माण मध्यप्रदेश शासन,संस्कृति विभाग के स्वराज संचालनालय द्वारा भी किया गया।
‘गुण्डाधूर’ की अपार लोकप्रियता के कारण ही बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों का ध्यान भूमकाल और उसके नायक क्रांतिवीर गुण्डाधूर की ओर आकृष्ट हुआ।उस पर चर्चा आरंभ हुई और इतिहास-लेखन का माहौल भी बना।
सन् 1988 में जगदलपुर प्रवास के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व.श्री अर्जुन सिंह ने इस नाटक की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी और गुण्डाधूर की स्मृति को अक्षुण्ण बनाने के लिये आवश्यक कदम उठाने की बात कही थी।

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