छत्तीसगढ़

कलेजे को जो फाड़ दे विजय का झंडा गाड़ दे। सुनो…यशोगान के रस्म का मैं सुंदर गीत सुनाता हूं..(स्वरचित कविता अंश)

 

 

 

(अंश) हे ईमानदार देश के आम लोगों …ईमानदारी से अपने हिस्से का काम करते हैं तो कोई तालियां नहीं बजाता.. इसकी परवाह न करें ना ही बेवजह किसी के लिए तालियां बजाने में समय व्यर्थ करें …मात्र जयजयकार के बीच रहने वाले जोकरों से कुछ नहीं होने वाला..अपने महंगे कपड़ों के अंदर ऐसे लोग निपट नंगे हैं(नीचे पढ़े…)

 

 

धार…एक अभियान(विसंगतियों के खिलाफ शंखनाद) किश्त-103/नवीन श्रीवास्तव,पत्रकार,लेखक

 

(स्वतंत्रता दिवस पर विशेष)

स्वतंत्रता क्या है कि …तुम अधिकार के साथ कर्तव्य को पूरी तरह जानते हो बिना कर्तव्यों की पूर्ति किया अधिकार नहीं मिलता.. स्वतंत्रता है कि तुम पूरी तरह खिल सको पूर्णता के साथ .. चेतना के विस्तार लिए इस आत्मिक बोध के साथ कीअहम् ब्रह्मास्मि …जागरण की सीमा बहुत है । हे देश के ईमानदार लोगों मैं जानता हूं .. इस देश की सारी व्यवस्थाएं आप जैसे लोगों से चल रही..आप सब ही माँ भारती के असली लाल हैं .. व्यवस्था चला रहे..जो जिम्मेदार होते हुए भरस्ट हैं वे कीड़े-पतंगे से ज्यादा कुछ नहीं..मुझे यकीन है ..एक दिन सब ठीक हो जायेगा.. है देश के आम लोगों.. क्या हुआ कि आप लोगों को कोई नहीं जानता,क्या हो गया कि जब सारे दुःख ,तकलीफों के बीच आप सब ईमानदारी से अपने हिस्से का काम करते हैं तो कोई तालियां नहीं बजाता.. तालिया की परवाह न करें ना ही बेवजह किसी के लिए बजाने में समय व्यर्थ करें आप सब जुटे रहें…दायित्वबोध लिए ईमानदारी से देश मजबूत होता है.. यही राष्ट्रवाद है ..डटे रहें …गले में मैं फलाने…मैं ढेकाने.. का पोस्टर टांग कर घुमने वाले मात्र जयजयकार के बीच रहने वाले जोकरों से कुछ नहीं होने वाला..अपने महंगे कपड़ों के अंदर ऐसे लोग निपट नंगे हैं* ईमानदारी सहज नहीं इन बेईमानों से,भरस्ट लोगों से कुछ नहीं हो सकता.. इनकी बड़ी इमारतों बड़ी गाड़ियों तामझाम काफ़िलों का कोई मतलब नहीं देश का एक-एक पैसा बहुत कीमती है अपने काम में लगे रहो डगर मुश्किल भरा है..पर याद रखें सृजन के लिए..प्रसव वेदना से गुजरना ही पड़ता है..गुजरना ही होगा..

सुबह हो गई..जागिये..मैं दस्तक दे रहा हूं.. तुम्हारे घर..दरवाजे पर..इंद्रियों से रस भोगने को आमंत्रित करता बाजार..हमारे संवेदनाओं को दुर्बल बना रहा है..हमारी नई पीढ़ियां कमजोर हो रही है.. संवेदनाओं से रहित ह्रदय ..हमारे महान देश के स्मष्ठि भाव को तोड़ रहा है *उठो ..उठो ,प्रपंच को छोड़..यह जो आज सुबह का उजाला है खाश है.. इसमें तिरंगे की खुशबू है .. यह रोग प्रतिरोधक शक्ति से युक्त है थोड़ा जोर से सांस लो ..इस खुशबू में देश के लिए मर मिटने वाले बलिदानियों का अहसास है* बहुत कुछ कहना है..पर पहले साथ में जागा करते हैं… उठ कर केवल आँखों से नहीँ ..फेफड़े को फुला.. सांस के साथ .आजादी के पर्व .की खनक लिए सुबह की रोशनी को ह्रदय तक खींच लेते हैं… आज देश के लिए मर मिटने की भावना हमारे इरादों को वज्र का बना सकता है ..आइए कितना सोओगे उठो …साथ में उठें.. एक साथ उठें आजादी और देश भक्ति का जज्बा लिए आज सुबह का यह उजाला ..जब कहीँ मुश्किलों का अँधेरा होगा काम आएगा.. इसी उम्मीद नहीं वरन दृढ़ विश्वास के साथ ..सुप्रभात..स्वतंत्रता दिवस पर अशेष बधाईयों के साथ..आपका नवीन श्रीवास्तस्व,पत्रकार,लेखक हरेपन लिये बस्तर से

 

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