बासागुड़ा कभी थी सबसे बड़ी मंडी, नक्सलवाद ने छीनी रौनक

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सोमवार को बीजापुर के उसूर ब्लाक के बासागुड़ा जा रहे हैं। वे वहां नक्सल हमले के बाद के हालात की समीक्षा करने के साथ तैनात जवानों का मनोबल भी बढ़ाएंगे। दोपहर बाद उनके प्रवास का कार्यक्रम है। बीजापुर जिले के जिस बासागुड़ा में शाह जाने वाले हैं, वह कभी दक्षिण बस्तर के वनोपजों की सबसे बड़ी मंडी हुआ करती थी। आदिवासी संग्राहक इमली, महुआ, चिरौंजी व अन्य वनोपज यहां साप्ताहिक बाजार दिवस शुक्रवार को बेचने लाते थे। बासागुड़ा काफी समृद्ध हुआ करता था। यह जगदलपुर से करीब 200 किमी व जिला मुख्यालय से 50 किमी दूर है।

वर्ष 2000 में राज्य बनने तक बासागुड़ा संभाग व जिला मुख्यालय बस्तर से सड़क मार्ग से जुड़ा था। वहां तक राज्य परिवहन निगम की बसें जाती थीं। बीते करीब दो दशक में हालात बदल गए हैं। नक्सलवाद ने इसकी रौनक छीन ली है। साप्ताहिक बाजार के दिन भी खास चहल-पहल नहीं रहती। बाजार दिवस पर भी नक्सलियों की स्माल एक्शन टीम जवानों व अन्य लोगों पर हमले कर चुकी है। जो बासागुड़ा कभी चिरौंजी की सबसे बड़ी मंडी हुआ करता था वह अब वीरान हो गया है। यहां से बड़ी संख्या में आबादी का पलायन हुआ है। इसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि वर्ष 2001 में 266 परिवार थे और इसकी आबादी 1169 थी। 2011 की जनगणना के अनुसार बासागुड़ा में 61 परिवार निवासरत हैं जिनकी कुल आबादी 285 है। 2020 में यहां की जनसंख्या 329 आंकलित की गई है। तालपेरू नदी बासागुड़ा को दो भागों में बांटती है। इसके ओर पुरानी बस्ती तो दूसरी ओर थाना व कैंप हैं।

बासागुड़ा से करीब 20 किमी आगे तर्रेम है। उसके आगे सिलगेर पड़ता है। उस क्षेत्र में नक्सलियों से हुए मुठभेड़ में 22 जवानों की शहादत के बाद शाह का दौरा कई मायनों में खास माना जा रहा है। बासागुड़ा के अलावा इलाके के तर्रेम, न्यू तर्रेम, सारकेगुड़ा, मुरकीनार, तिम्मापुर में सीआरपीएफ के कैंप हैं, जहां हजारों जवान नक्सलवाद को नेस्तनाबूत करने अपने जान की बाजी लगाए हुए हैं। दो दिन पहले हुए मुठभेड़ में भी इलाके में तैनात सीआरपीएफ 168 बटालियन के जवानों ने बलिदान दिया है।

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