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बंदियों को मनपसंद खाना न मिलना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं’, सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि जेल में बंद कैदियों, चाहे वे दिव्यांग हों या नहीं, को महंगा या पसंदीदा खाना न मिलना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। जस्टिस जे बी पारडीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार सभी कैदियों को है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे व्यक्तिगत पसंद के लग्जरी खाने की मांग कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने कहा कि राज्य की जिम्मेदारी यह है कि वह हर कैदी को पर्याप्त, पौष्टिक और चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त भोजन दे। अगर कोई कैदी बीमार है या दिव्यांग है, तो उसे डॉक्टर की सलाह के अनुसार खाना मिलना चाहिए, लेकिन पसंद का या महंगा खाना न मिलना कोई संवैधानिक अधिकार का हनन नहीं है।

जेलें सुधार केंद्र हैं, सुविधा स्थल नहीं’
कोर्ट ने कहा कि जेलें समाज की सुविधाओं का विस्तार नहीं हैं, बल्कि सुधार केंद्र हैं। कुछ नॉन-एसेंशियल या विलासिता की चीजें अगर न भी दी जाएं, तो जब तक उससे स्वास्थ्य या गरिमा को सीधा नुकसान नहीं होता, तब तक उसे मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।

बता दें कि यह फैसला वकील एल मुरुगनाथम की याचिका पर आया, जो बीकर मस्कुलर डिस्ट्रॉफी नाम की बीमारी से पीड़ित हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें जेल में रहते हुए प्रोटीन युक्त खाना जैसे अंडा, चिकन, मेवे रोजाना नहीं मिले, और जरूरी चिकित्सा भी नहीं मिली। इससे पहले मद्रास हाई कोर्ट ने उन्हें 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था, जिसके खिलाफ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश: जेलों में दिव्यांग कैदियों की पहचान जरूरी, मिले बराबर इलाज और सुविधाएं

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को तमिलनाडु की जेलों को आदेश दिया कि वे कैदियों की भर्ती के समय उनकी दिव्यांगता की पहचान करें और सभी जेलों में दिव्यांगों के अनुकूल सुविधाएं सुनिश्चित करें। मामले में सुनवाई के दौरान जस्टिस जे बी पारडीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि हर कैदी को मौका दिया जाए कि वह अपनी किसी भी दिव्यांगता और उससे जुड़ी ज़रूरतों की जानकारी दे सके। कोर्ट ने कहा कि दिव्यांग कैदी समाज के सबसे वंचित और संवेदनशील वर्गों में आते हैं। जो सामाजिक और ढांचागत मुश्किलें वे बाहर झेलते हैं, वे जेल में और भी बढ़ जाती हैं।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आज तक दिव्यांग या ट्रांसजेंडर कैदियों के लिए ऐसा कोई विशेष कानून या नीति नहीं है, जो उनकी गरिमा और अधिकारों की गारंटी देती हो, जैसे कि महिला कैदियों के लिए कुछ बुनियादी सुरक्षा दी गई है

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