यह फूल, तितलियां इंद्रधनुष और बेटियां । तुम चुप रहो रंगों को कुछ कहने दो।।

( मौलिक ..डायरी से )
होली पर विशेष/नवीन श्रीवास्तव, वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक, जीवनदायिनी बस्तर से🌴🌴🌴
रंगों का त्यौहार कितना अद्भुत है ना.. रंगों का कहां कोई धर्म होता है.. इसकी जाति नहीं होती ..इसका कोई समुदाय नहीं होता ..रंग कहीं होने के लिए किसी से पूछता नहीं है की भाई तुम कौन हो.. अमीर हो, गरीब हो.. बस रंग तो रंग है.. इसीलिए तो बादल है,पेड़ है, तितलियां हैं, इंद्रधनुष है हरी -भरी वादियां हैं बहते समुंदर हैं बहती नदी है ..
कहते हैं रंगो के प्रभाव का अपना विज्ञान है.. विज्ञान जगत से जुड़े विद्वान भी इससे सहमत है उनका भी मानना है कि..हरे रंग का संबंध जीवनदायनी उल्लास और उमंग से है ,लाल रंगो को देखकर उत्तेजना बढ़ सकती है …चटक रंग से आसक्ति और हल्के कुछ रंगों से व्यक्ति के विरक्ति को समझा जा सकता है …यही कारण है की रंगों के इस्तेमाल का चलन काफी है सचमुच में रंगों की अपनी महिमा है क्योंकि रंग है…. जंगल जमीन और आसमान है कुल मिलाकर रंग केवल लिपाई पुताई नहीं है ..रंग जिंदगी में शामिल छटा है ,जो घटा बन, धूप बन ,छाया बन … एहसासों की खिड़कियों को खोल देता है ..अगर हम एहसासों की इन खिड़कियों को खुला रखें तो सहजता से किसी के चेहरे से उड़ते हुए रंगों को हम समझ सकते हैं दूसरे के दुख को,दर्द को समझ सकते हैं ..किसी के सुर्ख गालों में अनकही कहानी को हम पढ़ सकते हैं, किसी की होठों में लगे लिपस्टिक के परतों की कहानी पढ़ सकते हैं …समझ सकते हैं रंगों के मिजाज को समझना अगर हमें आ गया तो मुझे लगता है हम मुश्किलों से ,कठिनाइयों से बच सकते है और यह रंग नए तरह के “नवीन” सद्भावनाओं के दरवाजों को खोल सकता है रंगों की अपनी भाषा है किसी की आंखों की लालिमा उसके नशे में होने की चुगली करता है, तो किसी के आंखों में उभर आए लाली बिस्तर में करवटों पर रात गुजारने की कहानी कहती है ,कभी आंखों में उभर आए लाल डोरे की चमक वासना को प्रकट करती है…. कितनी- कितनी कहानी छुपी है इन रंगों में आपने कभी महसूस किया यह बस अपनी दुनिया में रहते हो रंगों को महसूस कीजिए …!!!
दीवारों का रंग उड़ने से केवल घर उदास नहीं होता अगर उड़ते हुए रंगों को हम बचा कर नहीं रखें तो जिंदगी भी बेरंग होने लगती है रंगों की परिभाषा और प्रचलन जारी रहे इसी तरह के अर्थो को लेकर हम होली रंग मेंटर गुलाल खेलते हैं ताकि एहसास जीवंत होने लगे रंगों के फुहार से तन ही नहीं मन भी भीग जाए यहां भीगने का मतलब गीला होना नहीं शायद रंगों की इस त्यौहार का अर्थ अनुभूतियों के अलग-अलग रंगों से है जो हम इंसानों के माध्यम से प्रकट होता है इसके लिए जरूरी है कि अनुभूतियों सूख कर पत्थर की तरह ना हो जाए इसलिए जरूरी है हम रंगों से खेलते रहे ..एक सज्जन ने मुझसे पूछा की जो नेता होते हैं वह सफेद झक्क क्यों कपड़े पहनते हैं मुझे लगता है दूध की तरह जीवनदाई सफेदी की तरह नेताओं के सफेद कुर्तों का एक दायित्व होता होगा .. सफेद रंग होता ही इसलिए है कि सभी रंगों को अपने अंदर समाहित कर ले ..रंगों की तरह सफेद रंग का भी बहुत अर्थ है राजनीति में इसका चलन सादगी के लिए भी हो सकता है पर विश्वास किया जा सके तब आज सफेदी का अर्थ बुराइयों को ढकने में हो रहा है ।
(फिर मिलता हूं किसी विषय के साथ)पावन होली की बहुत शुभकामनाएं-नवीन श्रीवास्तव।



