छत्तीसगढ़

पत्रकारिता भी योग है ,फिर तो पक्का है.. कोई सुवासित फूल खिल उठे..निकल आये समाज के लिए कोई फल से लदे हरे -हरे पेड़.. या फिर किसी के लिए निकल आये कल्पवृक्ष

 

 

नवीन श्रीवास्तव पत्रकार एवं लेखक ,जगदलपुर(बस्तर)

योग दिवस पर विशेष ..खासकर उन पत्रकार साथियों के लिये जो निःशर्त सत्व को सहेजने संघर्षरत हैं

पत्रकारिता भी योग है…जोड़ जैसे योग में प्राप्ति के लिए अशुध्दियों का विसर्जन जरूरी है वैसे ही *पत्रकारिता में भी जरूरी है व्यक्तिगत महत्वांक्षाओं के साथ इंद्रिसुखों का त्याग करें.. पत्रकारिता गले में टँगा कोई पोस्टर मात्र नहीं है* …बल्कि यह भी एक पत्रकार के खास होने का भाव है ,होने का ढंग..एक दायित्वबोध ..जब जब कोई पत्रकार दायित्व बोध लिए लक्ष्य प्राप्ति के लिए जुटता है ..तो समझें ,संभव है … योग के उच्चतम अवस्था में स्फुरण की तरह अंकुरण भी हो यकीन करें.. फिर तो पक्का है कोई सुवासित फूल खिल उठे..निकल आये समाज के लिए कोई फल से लदे हरे -हरे पेड़.. या फिर किसी के लिए निकल आये कल्पवृक्ष.. हमेशा याद रखें.. खर-पतवार होने से खेत की जमीन.. उसका स्वरूप नहीं बदलता शेष ..को रहने दें अशेष को जन्म देने आपका यह दिन दिव्य शुभता लिए हो..अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर अशेष बधाइयां .. सादर🙏🙏🙏

Related Articles

Back to top button