छत्तीसगढ़ के रास्ते पहुंची महाराष्ट्र, ऑक्सीजन एक्सप्रेस; पहुंचाए गए ग्रीतेजीन कॉरिडोर बनाकर टैंकर

रायपुर, रेलवे ने ऑक्सीजन एक्सप्रेस के परिचालन को एक चुनौती के रूप में लिया। महाराष्ट्र के कलंबोली से नागपुर, गोंदिया, डोंगरगढ़, राजनांदगांव, दुर्ग, भिलाई, रायपुर, लखोली होते हुए विशाखापट्टणम तक और वापस इसी रास्ते से नासिक तक पहली ऑक्सीजन एक्सप्रेस सफलतापूर्वक चलाई गई। रेलवे ने लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन टैंकरों के आवागमन के निवेदन पर तुरंत काम शुरू किया। बहुत कम समय में रैंप बनाया गया।
रो-रो सेवा के आवागमन के लिए रेलवे को कुछ स्थानों पर घाट सेक्शन, रोड ओवर ब्रिज, टनल, कर्व्स, प्लेटफॉर्म कैनोपीज, ओवर हेड इक्विपमेंट आदि विभिन्न बाधाओं पर विचार करते हुए पूरे मार्ग का एक खाका तैयार करना था। इस मूवमेन्ट में ऊंचाई एक महत्वपूर्ण पहलू है। रेलवे ने वसई के रास्ते मार्ग का खाका तैयार किया। 3320 मिमी की ऊंचाई वाले सड़क टैंकर टी1618 के मॉडल को फ्लैट वैगनों पर रखा जाना संभव पाया गया। ऑक्सीजन क्रायोजेनिक और खतरनाक रसायन है, इसलिए रेलवे को अचानक एक त्वरण, मंदन से बचना पड़ता है। बीच-बीच में प्रेशर की जांच करनी पड़ती है। खासकर जब यह भरी हुई स्थिति में हो। फिर भी रेलवे ने इसे चुनौती के रुप में लिया और मार्ग का खाका तैयार किया।
लोगों को प्रशिक्षित किया और इन विशेष आकार के टैंकरों को वसई, सूरत, भुसावल, नागपुर , गोंदिया, डोंगरगढ़, राजनांदगांव, दुर्ग, भिलाई, रायपुर, लखौली के रास्ते से विशाखपट्टनम तक ले जाया गया। कलंबोली और विशाखापट्टनम के बीच की दूरी 1850 किमी से अधिक है। इसे इन टैंकरों ने केवल 50 घंटों में पूरी की थी। 100 से अधिक टन एलएमओ (लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन) वाले 7 टैंकरों को 10 घंटे में लोड किया गया और केवल 21 घंटे में वापस नागपुर ले जाया गया। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे को ऑक्सीजन एक्सप्रेस पूर्व तट रेलवे से लाखौली इंटरचेंज प्वाइंट पर 10ः45 सुबह में प्राप्त हुआ था। इसे रायपुर मंडल ने दुर्ग इंटरचेंज प्वाइंट पर नागपुर मंडल को 12ः25 दोपहर में सौंप दिया। नागपुर मंडल ने राजनांदगांव, डोंगरगढ़, गोंदिया, भंडारा रोड, कांप्टी स्टेशनों से सफलतापूर्वक परिचालन करते हुए इसे रात्रि 8ः10 बजे 23 अप्रैल को मध्य रेलवे नागपुर स्टेशन पहुंचा दिया।
नागपुर में 3 टैंकरों को उतारा गया। शेष 4 टैंकर शनिवार सुबह 10ः25 बजे नासिक पहुंच गए हैं। नागपुर से नासिक का अंतर केवल 12 घंटे में पूरा किया। ट्रेनों के माध्यम से ऑक्सीजन का परिवहन, सड़क परिवहन की तुलना में लंबा है परंतु फास्ट है। रेलवे से परिवहन में दो दिन लगते हैं जबकि सडक मार्ग से 3 दिन लगते हैं। ट्रेन दिन में 24 घंटे चलती है। ट्रक ड्राइवरों को रोड पर हाल्ट आदि लेने की आवश्यकता होती है। इन टैंकरों की तेज गति के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया है। आवाजाही की निगरानी शीर्ष स्तर पर की गई। यह हमारे लिए एक कठिन समय है। हमारे लिए राष्ट्र सबसे पहले है। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे की ओर से कोरोना संक्रमण से उत्पन्न लॉकडाउन की विषम परिस्थितियों में भी आवश्यक वस्तुओं के परिवहन के साथ-साथ यात्री सेवा भी अनवरत जारी



