मेरे कमरे का छत नीले आकाश का है ।ख्वाहिशें हजारों हैं सितारों की तरह।(मेरी डायरी के पन्नों से)

धार एक ..अभियान (विसंगतियों के खिलाफ शंखनाद)// नवीन श्रीवास्तव पत्रकार,लेखक

सपनों की कोई जात बिरादरी नहीं होती कोई जात, धर्म और मजहब भी नहीं होता ..संभव है कुलीन परंपरावादी किसी युवक के सपने में कोई गैर परम्परावादी कन्या परी बनकर आ जाए.. सपने में यह भी संभव कि एक निर्धन कन्या के सपने में … अमीर घराने का सुंदर युवक आये और उस गरीब कन्या के लिए सावन में झूला तैयार करें …ऊंच-नीच, अमीर– गरीब हमने बनाया हम और तुम लाख कोशिश कर लें पर कई जगह है जो अभी भी हमारे कीचड़ से सने पैरों से गंदे होने बचे हैं ..यह सुकून देने वाला है हालांकि इस बात को लेकर ऐसे दलालों की कमी नहीं जो सपनों की खरीद-फरोख्त करने लगे हैं …ऐसे लोग दूसरों को उनके सपने साकार करने की बात करते हैं और कभी उन्हें अपना उत्पाद बेचते हैं ..तो कभी उन्हें धोखा देते हैं ..चारों तरफ ऐसे मक्कारों की दुकान है …जनता को आत्म उत्थान के रास्ते दिखाने के बजाय अपनी जिम्मेदारी भूल व्यवस्था तंत्र पर बैठे लोग भी क्या सपनों के नाम पर ठगी नहीं कर रहे हैं.. क्या आजकल ऐसी परिस्थितियां नहीं गढ़ी जा रही है …जिससे सहज जीवन जीना भी कठिन हो जाए.. फिर यह लोग बड़ी आसानी से सहज जीवन के तरकीब बेचते हैं वह भी बड़ी बड़ी पोस्टर बनवा कर कितना अजीब है.. सुख और सपनों के लिए योजनाओं की दुकान.. इस बात को सोचने किसके पास समय है कि कोई सोचे की बुनियादी जरूरतों की चीजें जिंदगी से निकल कर कब बिचौलियों के हाथों में आ गई.. नदिया कैसे सूख गई …खेत कैसे कम पड़ गए.. जंगल कैसे गायब हो रहे ..पर्वतों को कौन डकार गया ..पर कितना अच्छा है ना सफेदपोश चोर लोग कम से कम अभी हमारे दिल और दिमाग में घुसकर हमारे सपने चुरा तो नहीं सकते अभी भी है… हमारे अंदर सपनों को देखने की आजादी इसे बचा कर रखो..बचा कर रखना..ताकि आने वाली पीढ़ियां के लिये भी हो(जारी)

Related Articles

Back to top button