देशव्यापी कैंसर रिपोर्टिंग पर SC हुआ सख्त, केंद्र और राज्य की सरकारों को किया जवाब तलब

देश में बढ़ते कैंसर मामलों और उनके इलाज में देरी को गंभीर मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार और सभी राज्यों को नोटिस जारी किया है। अदालत ने पूछा है कि क्या पूरे देश में कैंसर को ‘नॉटिफाएबल बीमारी’ घोषित किया जाना चाहिए, ताकि हर मरीज की जानकारी सरकार तक समय पर पहुंचे और इलाज में देरी न हो।
चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अगुवाई वाली पीठ डॉक्टर अनुराग श्रीवास्तव की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। डॉक्टर श्रीवास्तव एम्स दिल्ली में सर्जरी विभाग के प्रमुख रह चुके हैं। उन्होंने कहा कि देश में कैंसर की रिपोर्टिंग अनिवार्य न होने से न सरकार को सही आंकड़े मिल पाते हैं और न ही मरीजों का इलाज समय पर शुरू हो पाता है। याचिका में बताया गया कि कुछ राज्यों ने कैंसर को नॉटिफाएबल बीमारी घोषित किया है, जबकि कई राज्यों में यह लागू ही नहीं है, जिससे देशभर में रिपोर्टिंग और इलाज में बड़ी असमानता है।
सही आंकड़ों की भारी कमी
याचिका के अनुसार, आईसीएमआर की कैंसर रजिस्ट्री फिलहाल केवल लगभग 10% आबादी को ही कवर करती है। ग्रामीण इलाकों की कवरेज तो सिर्फ 1% के आस-पास है। इसका मतलब है कि देश में कैंसर के असली आंकड़े सरकार तक पहुंचते ही नहीं। इससे न बीमारी पर काबू पाने की सही रणनीति बन पाती है और न मरीजों को समय पर इलाज।
डिजिटल कैंसर रजिस्ट्री की मांग
याचिकाकर्ता ने कहा कि पूरे देश में एक रियल-टाइम डिजिटल कैंसर रजिस्ट्री बनाई जाए, जैसे कोविन प्लेटफॉर्म ने टीकाकरण के दौरान किया था। इससे हर मरीज का रिकॉर्ड तुरंत सिस्टम में दर्ज होगा और इलाज में देरी नहीं होगी। उन्होंने यह भी कहा कि गलत प्रचार और अप्रमाणित इलाज। जैसे गोमूत्र से कैंसर ठीक होने के दावों से लोगों को बचाना जरूरी है, क्योंकि इससे कई मरीज सही इलाज से दूर हो जाते हैं।
कोर्ट में अगली सुनवाई
अदालत ने केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा है कि देश में कैंसर को नॉटिफाएबल बीमारी बनाने पर उनकी क्या राय है और इस दिशा में वे क्या कदम उठा सकते हैं। कोर्ट अब आगे की सुनवाई सरकार और राज्यों के जवाब मिलने के बाद करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह नियम लागू हुआ, तो देश में कैंसर को लेकर आंकड़ा प्रणाली और इलाज की व्यवस्था पहले से कहीं बेहतर हो सकती है।



