अधिकारों के उल्लंघन पर हो सकता है ऐक्शन, SC

नई दिल्ली. आपराधिक मामलों की जांच में नेताओं के विवादित बोलों पर लगाम लगाने के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। पांज जजों की बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि गलत बयाने के लिए नेता या मंत्री खुद जिम्मेदार होगा। इसके लिए कोई सरकार अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार नहीं हो सकती।

अभिव्यक्ति की आजादी पर अतिरिक्त प्रतिबंध नहीं

जस्टिस वी रामासुब्रमण्यम ने कहा कि इस तरह किसी के भी बयान देने पर रोक नहीं लगाया जा सकता लेकिन अगर किसी के बयान से अधिकारों को उल्लंघन होता है तो कार्रवाई की जा सकती है। वहीं जस्टिस नागरत्ना ने संविधान के अनुच्छेद 51A पर जोर देते हुए कहा कि नेताओं को अपने कर्तव्य का बोध होना चाहिए। उन्होंने कहा कि उन्हें विचार करना चाहिए कि वे नागरिकों के लिए किस तरह का उदाहरण स्थापित कर रहे हैं।

फैसला सुनाते हुए जस्टिस वी रामासुब्रमण्यम ने कहा, किसी के भी बोलने पर वही प्रतिबंध लागू होंगे जो कि संविधान में दर्ज हैं। इसके अलावा अतिरिक्त प्रतिबंध नहीं लगाए जा सकते। जस्टिस नागरत्ना भी इस बात से सहमत रहीं। हालांकि उन्होंने अपना अलग फैसला सुनाया।  फैसला सुनाते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा, कोई भी मंत्री बयान दे सकता है। उन्होंने कहा कि अगर मंत्री या नेता का बयान सरकार के स्टैंड पर है तो इसके लिए सरकार उत्तरदायी है लेकिन अगर कोई हल्की बात कही जाती है तो यह केवल व्यक्तिगत  टिप्पणी मानी जानी चाहिए।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी पर अगर कोई अतिरिक्त प्रतिबंध लगाने हैं तो यह काम संसद का है। राजनीतिक दलों को अपने नेताओं पर प्रतिबंध लगाने या फिर सीमा तय करने के लिए नियम बनाने चाहिए। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर किसी को लगता है कि वह नेता या मंत्री के के बयान से आहत हुआ है तो वह सिविल रेमेडी के लिए कोर्ट का रुख कर सकता है।

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