कविता :- प्रकृति और स्त्री

प्रकृति हूं खुद संवर लुंगी ।
जो टूटा है उसे भी अपने अंदर समा लूंगी ।
स्त्री हूं टूट कर भी सब कुछ जोड़ दूंगी।
जो मेरे पास है उसे भी सब पर न्योछावर कर दूंगी ।
प्रकृति हूं धरती पर जीवन का हर रंग निखार दूंगी ।
नव सृजन के लिए विनाश लीला भी आरंभ कर दूंगी ।
स्त्री हूं नवजीवन को आकार दे दूंगी ।
आंच अगर आए उस जीवन पर तो हर सम्मान भी धिक्कार दूंगी।
प्रकृति हूं जीवन के अनंत ऊर्जा के रूप में सदा गतिमान रहूंगी ।सत रज और तम गुणों में विभक्त होकर सदा प्रगट होती रहूंगी । स्त्रियों हूं हर रूप में सदा कर्त्तव्य निभाऊंगी ।
परिस्थिति अनुसार सरस्वती लक्ष्मी काली के रूप में पूजी जाऊंगी।
प्रकृति हूं संस्कारों से संस्कृति को जन्म दूंगी ।
भूत भविष्य और वर्तमान की हर सीमा से परे हो जाऊंगी।
स्त्री हूं संस्कारों का प्रतिबिंब बनूंगी ।
हर काल की स्मृति मे अपनी छाप छोड़ जाऊंगी ।
प्रकृति हूं अपनी हर कृति में खुद को ढूंढना चाहूंगी।
मेरे सृजन से जननी का रूप लिये स्त्री में खुद को पाऊंगी ।

श्रीमती वनश्री चेरपा भगत
व्याख्याता वनस्पति शास्त्र

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