सरकार के तीन बड़े फैसले, जिनसे विधानसभा चुनाव के नतीजे हो सकते हैं प्रभावित

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान आए तीन महत्वपूर्ण फैसलों और घोषणाओं का व्यापक असर पड़ सकता है। इनमें रसोई गैस की कीमतों में कमी, सुपरस्टार रजनीकांत को दादा साहब फाल्के पुरस्कार देने की घोषणा और ब्याज दरों पर रिजर्व बैंक के फैसले को वापस लेना शामिल है। ये फैसले उस समय हुए हैं, जब असम और पश्चिम बंगाल के साथ तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार चरम पर है। 

भाजपा इन विधानसभा चुनावों को न केवल प्रतिष्ठा, बल्कि बड़े बदलाव और भविष्य की रणनीति का चुनाव मानकर लड़ रही है। उसने असम और पश्चिम बंगाल में अपनी पूरी ताकत झोंकी हुई है। साथ ही तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश में है। ऐसे में हाल के तीन बड़े फैसले उसके पक्ष में माहौल बना सकते हैं। 31 मार्च को रिजर्व बैंक ने विभिन्न बचत योजनाओं पर ब्याज दरें घटाने की घोषणा की थी, लेकिन एक अप्रैल की सुबह वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उस फैसले को वापस लेने का ऐलान किया है। बचत योजनाओं पर ब्याज की कमी से लोगों में नाराजगी हो सकती थी और अब उसे कम करने की कोशिश की गई है।

इसके साथ ही केंद्र सरकार ने रसोई गैस की कीमतों को भी कम किया है और संकेत दिए हैं कि जल्दी पेट्रोल-डीजल के दाम भी घट सकते हैं। महंगाई से जूझ रहे आम आदमी को इससे काफी राहत मिल सकती है और इसका असर भी विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है। तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव के दौरान ही सुपरस्टार रजनीकांत को दादा साहब फाल्के पुरस्कार देने का फैसला भी आया है। तमिलनाडु में रजनीकांत की खासी अपील है और वह किसी का समर्थन नहीं कर रहे हैं, लेकिन भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का यह फैसला रजनीकांत के समर्थकों को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश जरूर है। गौरतलब है कि रजनीकांत ने अपनी राजनीतिक पारी को फिलहाल स्थगित कर रखा है, जिससे उनका समर्थक वर्ग असमंजस की स्थिति में है। अब भाजपा ने उसे अन्नाद्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधन के पक्ष में खींचने की कोशिश की है।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों से उन राज्यों में तो सरकार गठित होगी ही, लेकिन इसका राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में भी काफी महत्व है। असम को छोड़कर सभी भाजपा की पहुंच से दूर वाले राज्य हैं। पार्टी की कोशिश है कि वह इन राज्यों में अपना राजनीतिक बजूद बढ़ाए, जिससे कि 2024 के लोकसभा चुनाव की उसकी रणनीति को व्यापक स्वरूप मिल सके और नए क्षेत्रों में पहुंच बने।

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