हजारों वर्ष पहले मोहन जोदड़ो की खुदाई में निकली प्रतिमा की आराधना का पर्व है थधडी


बस्तर में सुहिणी सोच महिला विंग 6 सितम्बर को थधडी पर्व मनाएंगे
जगदलपुर/नवीन श्रीवास्तव। थदड़ी शब्द का सिन्धी भाषा में अर्थ होता है ठंडी, शीतल. रक्षाबंधन के आठवें दिन इस थधड़ी पर्व को समूचा सिन्धी समाज हर्षोल्लास से मनाता है। आज से हजारों वर्ष पूर्व मोहन जोदड़ो की खुदाई में माँ शीतला देवी की प्रतिमा निकली थी ऐसी मान्यता है कि उन्हीं की आराधना में यह पर्व मनाया जाता है।
सुहिणी सोच महिला विंग अध्यक्षा रजनी दण्डवानी ने जानकारी दी किसी भी धर्म के त्यौहार और संस्कृति उसकी पहचान होती हैं। त्यौहार, उत्साह, उमंग व खुशियों का ही स्वरूप हैं। सभी धर्मों के कुछ विशेष त्यौहार या पर्व होते हैं जिन्हें उस धर्म से संबंधित समुदाय के लोग मनाते हैं। ऐसा ही पर्व है सिंधी समाज का ‘थधड़ी’। थधड़ी शब्द का सिंधी भाषा में अर्थ होता है ठंडी, शीतल. यह थधडी पर्व रक्षाबंधन के आठवें दिन और हरछठ के दूसरे दिन इस पर्व को समूचा सिन्धी समाज हर्षोल्लास से मनाता है, जिसमें हरछठ के दिन विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए जाते है तथा ब्राम्हणी के घर उन्ही व्यंजनों के साथ कथा सुनकर व्रत पूरा किया जाता है। और घर में सभी सदस्य बांसी खाना ही खाते है इस बार थधड़ी पर्व 6 सितम्बर को है.
सिन्धी समाज की वरिष्ठ सदस्या चन्द्रा देवी नवतानी ने बताया बासी भोजन खाने की परंपरा काफी पुरानी है। जो कि चेचक जैसी माहमारी को रोकने के लिए शुरू की गई रही जो आज भी निरंतर इसी तरह निभाई जाती है, सिंधी समाज की महिलाओं ने थधडी व्रत में कथा सुनने के बाद शाीतला माता की स्तुति कर देश खुशहाली की कामना की.
*शीतला माँ का स्तुति गान कर उनके लिए कामना की, शीतल रहें व माता के प्रकोप से बचे रहें। इस दौरान ये पंक्तियाँ गाई जाती है.*
*ठार माता ठार पहिंजे बच्चणन खे ठार*
*माता अगे भी ठारियो तई हाणे भी ठार…*
इसका तात्पर्य यह है कि हे माता मेरे बच्चों को शीतलता देना। आपने पहले भी ऐसा किया है आगे भी ऐसा करना.
*सुहिणी सोच सचिव भारती लालवानी ने बताया सप्तमी को पूरा दिन घरों में चूल्हा नहीं जलता है एवं एक दिन पहले बनाया ठंडा खाना ही खाया जाता है. इसके पहले परिवार के सभी सदस्य किसी नदी, नहर, कुएँ या बावड़ी पर इकट्ठे होते हैं वहाँ माँ शीतला देवी की विधिवत पूजा की जाती है, इसके बाद बड़ों से आशीर्वाद लेकर प्रसाद ग्रहण किया जाता है। बदलते दौर में जहाँ शहरों में सीमित साधन व सीमित स्थान हो गए हैं। ऐसे में पूजा का स्वरूप भी बदल गया है, इस दिन घर के बड़े बुजुर्ग सदस्यों द्वारा घर के सभी छोटे सदस्यों को भेंट स्वरूप कुछ न कुछ दिया जाता है जिसे खर्ची कहते हैं। थधड़ी पर्व के दिन बहन और बेटियों को खासतौर पर मायके बुलाकर इस त्योहार में शामिल किया जाता है, इसके साथ ही उसके ससुराल में भी भाई या छोटे सदस्य द्वारा सभी व्यंजन और फल भेंट स्वरूप भेजे जाते हैं इसे ‘थधड़ी का ढि्ण’ कहा जाता है.*



