121 साल में पहली बार ट्रैक एंड फील्ड में भारत को मिला गोल्ड, इस ओलंपिक का पहला स्वर्ण पदक

भारत के स्टार एथलीट नीरज चोपड़ा ने टोक्यो ओलंपिक में स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया है। नीरज ने पुरुषों की भाला फेंक स्पर्धा में 87.58 मीटर के स्कोर के साथ शीर्ष पर रहे। इस जीत के साथ ही नीरज ने 121 साल के इतिहास में पहली बार ट्रैक एंड फील्ड में भारत को सोना दिला दिया है। वह फील्ड एंड ट्रैक में गोल्ड जीतने वाले पहले और व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण हासिल करने वाले दूसरे भारतीय हैं। उनसे पहले निशानेबाज अभिनव बिंद्रा ने गोल्ड जीता था।

एक सौ इकत्तीस करोड़ भारतीयों की उम्मीदें एक भाले की नोक पर टिकी हुई थीं। नीरज चोपड़ा के भाले पर। सोने की तलाश में टोक्यो पहुंचे बजरंग पुनिया कांसे पर टिक गए थे। अदिति अशोक भी गोल्फ में बस मुहाने पर ठिठक गई थीं। हॉकी में महिलाओं के हौसले और पदक से कुछ दूर रह जाने के भावुक क्षणों में बहे आंसू सभी को नम कर चुके थे। 2008 में अभिनव बिंद्रा की बंदूक की नली से निकला सुनहरा पदक पिछले 13 साल से खुद को बहुत अकेला महसूस कर रहा था। उसके ऊपर करोड़ों भारतीयों की उम्मीदों का बोझ बढ़ता जा रहा था। इस भार को साझा करने की बेहतरीन कोशिश मीराबाई चानू ने की पर वो चांदी पर रुक गई। सिंधु की शटल से भी कांसा ही निकल पाया। 

पहलवान रवि दहिया की सुनहरी उम्मीदें भी चांदी की चमक में बदल गईं। लवलीना के मुक्के से दमका कांसा सुकून भी दे रहा था और भविष्य की उम्मीद भी जगा रहा था। पर सोना तो सोना होता है। और सोने की चिड़िया रहे इस देश से बेहतर इसकी चमक को कौन समझ सकता है!! तमाम उपलब्धियों के बीच एक अजीब सी कसमसाहट बाकी थी। एक प्यास, खेलों के उस महाकुंभ में भारत के राष्ट्र गीत की धुन सुन लेने की प्यास, एक बेताबी अपने तिरंगे को सबसे ऊपर चढ़ते हुए देखने की। जब दुनिया के हमसे छोटे देश ये कर सकते हैं, तो हम क्यों नहीं? ओलंपिक में एक समय हॉकी ने ही सोने के तमगों से माँ भारती का अभिषेक किया है। फिर व्यक्तिगत स्वर्ण पदक अभिनव बिंद्रा लेकर आए। लगा कि ये सिलसिला चल पड़ेगा। पर तेरह साल लग गए हैं अगले स्वर्ण तिलक के लिए। 

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