अमेरिका एक ऐसे द्वीप ताइवान में दिलचस्पी क्यों दिखा रहा है, जिसे वह आधिकारिक तौर पर देश भी नहीं मानता है।

वॉशिंगटन- नैंसी पेलोसी ने ताइवान पहुंचकर चीन और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ा दिया है। हालांकि, इसके आर्थिक और सैन्य समेत कई कारण नजर आते हैं।  एक ओर जहां चीन इसे ‘आग से खेलना’ बता रहा है। वहीं, अमेरिका भी बढ़े हुए कदम पीछे लेने के मूड में नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सवालों के बीच एक सवाल यह भी है कि अमेरिका एक ऐसे द्वीप में दिलचस्पी क्यों दिखा रहा है, जिसे वह आधिकारिक तौर पर देश भी नहीं मानता है।

जियोस्ट्रैटेजी
अमेरिका और उसके उत्तर पश्चिम एशिया के सहयोगियों के लिए ताइवान का जियोस्टैटेजिक पहलु काफी अहम है। दरअसल, ताइवान फर्स्ट आईलैंड चेन के मध्य में है, जिसे चीन अपनी सैन्य व्यवस्था को रोकने के लिए अमेरिका की रणनीति के हिस्से के तौर पर देखता है। अब इस द्वीप के दक्षिण में बाशी चैनल है, जो लुजोन स्ट्रेट का हिस्सा है।

खास बात है कि यह उन चुनिंदा अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में से एक हैं, जिसके जरिए चीन की नौसेना आराम से आइलैंड चेन को जोड़ता है और पश्चिमी प्रशांत तक पहुंच सकता है। खास बात है कि इसके जरिए वह गुआम, हवाई जैसे इलाकों में अमेरिका के लिए खतरा बन सकता है।

आर्थिक संबंध
अमेरिका का हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ताइवान अहम साझेदारों में से एक हैं। हालांकि, दोनों देशों के बीच राजनयिक रिश्ते नहीं हैं, लेकिन ताइवान, अमेरिका का 8वां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार हैं। वहीं, ताइवान के मामले में अमेरिका उसका दूसरा सबसे ट्रेडिंग पार्टनर है।

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