शहर के सड़कों से गांव के पगडंडियों तक…बस्तर अधिकार मुक्ति मोर्चा

.ना वे सत्ता में हैं ना विपक्ष में.. पर बस्तर में आम लोगों के हकों की लड़ाई- लड़ने सहज विकल्प जरूर बन रहे..

जगदलपुर/नवीन श्रीवास्तव वरिष्ठ पत्रकार

वार्ड स्तर में सड़क,नाली से बस्तर में रोजगार,स्वास्थ्य जैसे विषय से लेकर नीजिकरण जैसे मुद्दों पर लगातार सक्रिय एवं अपनी आवाजों को बुलन्द करते बस्तर अधिकार मुक्तिमोर्चा इन दिनों हमेशा से बेहतर भविष्य के सपने संजोने वाले सभी ग्रास रूट.. वॉलिंटियर्स माने जाने वाले पंच, सरपंच, सचिव सहित अतिथि शिक्षकों, व आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से जुड़े मांगों की लड़ाई को लड़ने एक साथ योजनाबद्ध ढंग से विभिन्न स्तर एवं मोर्चे पर दिनों सक्रिय है ।

ऐसे में यह कहा जाए कि मुक्ति मोर्चा अगर अपने इस लडाई को किसी सार्थक परिणाम तक या फिर अंजाम तक पहुंचा पाती है तो यह मुद्दों को लेकर अवसर तलाशने वाले राजनीतिक पार्टियों के मुंह से मुद्दें का निवाला छिनने जैसा ही होगा इसी के साथ यह मोर्चा के खाते में नए अवसरों और रास्ता को खोल सकता है। यही वह मोर्चा है जिसने कोरोना जैसे आपदा के संक्रमण काल मे दूसरों के लिए अवसर ढूंढते और मशक्कत करते खुद अवसर को जाना ।बात अगर बस्तर के मुद्दों को लेकर हो तो मोर्चा लगातार आवाज उठाती रही है और सुर्खियों के साथ चर्चे में है यह मुद्दे पर होमवर्क फिर क्रमिक रूप से उसे स्वरूप देने के साथ कुछ समय में जनता से जुड़े समस्याओं एवं जनसरोकारों पर अपनी आवाज बुलंद कर लोगों के बीच अपनी जगह बना रही और मजबूत करते दिख रही है । अब आगे यह सियासी परिदृश्य के लिए कितना संदेश होगा कि उसे गंभीरता से लिया जा सकता । पर अगर मोर्चा को गंभीरता से ना भी लिया गया उक्त तरह से तो भी मोर्चा को भविष्य में लाभ हो सकता है क्योंकि बस्तरहित के साथ सकारात्मक विषयों पर अगर इसी तर्ज पर उसके द्वारा परिश्रम की जाती रही लड़ाई लड़ी जाती रहेगी तो याद रहे कि इस तरह की लड़ाई लड़ने वालों का नफा नुकसान जन भावनाएं तय करती है यह सर्वोच्च परुस्कार है परन्तु ऐसे में मुक्ति मोर्चा बस्तर के समस्याओं, विसंगतियों को लेकर अपेक्षा और उम्मीदों की लड़ाई कैसे लड़ता है यह देखना दिलचस्प हो सकता है । जन भावनाओं, उम्मीदों के साथ शक्तिशाली व्यवस्था तंत्र और सत्ता पर बैठे लोगों के साथ अन्य राजनीतिक पार्टियों के बीच अस्तित्व को लेकर खाका खीचना फिर उसे मुक्कमल तस्वीर बनाना आसान नहीं होगा पर इतना तो हो सकता है कि मोर्चा को कोई राजनीतिक पार्टी गम्भीरता से ना ले या कोई बस्तर अधिकार मुक्तिमोर्चा को ऐसे किसी का विकल्प ना माने पर शहर से लेकर ग्रामीण छेत्रों तक और शहर के सड़कों से गांव के पगडंडियों तक लोगों को अपनी समस्याओं एवं मांगो के लिए लड़ाई लड़ने सहज विकल्प के रूप में मोर्चा मिल ही जायेगा पर तब तक जब तक व्रत कुछ पाने और करने का पारदर्शिता लिए हो । सच तो यह है कि बस्तर में विकास के सारे जुमले और उसे लेकर श्रेय हासिल करने का लालच बेकार है क्योंकि छत्तीसगढ़ ही नहीं देश के नक्शे पर नवीन संभावनाओं के हरेपन को सहेजने वाले बस्तर में विकास कोई मुद्दा नहीं है बल्कि इसके जीवनदायिनी आबोहवा में सांस लेने वालों का यह दायित्व है!और यही सच है और इसी दायित्व बोध को देख बस्तर अपने लोगों का चुनाव करता है।

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