तो संभव है ..सदन ..थप्पड़ों से गूंज गया होता..???

.धार..एक अभियान(15 वर्षों से लगातार .. विसंगतियों के खिलाफ शंखनाद एक स्तम्भ/नवीन श्रीवास्तव,पत्रका

स्वच्छता के लिए कथनी करनी में भेद,अंतर खत्म करना जरूरी है ..और कथनी -करनी के बीच फर्क खत्म करने नीयत का साफ होना जरूरी होता है.. ईमानदारी आवश्यक है ..देखिए लगातार स्वच्छता अभियान चलाए जाने के बाद कमी रह ही जाती है..जरूरी है कि
हमारे अंदर से भी अशुध्दियों का सफाया,विसर्जन हो..खैर.. गत दिवस कर्नाटक विधानसभा के दौरान एक वरिष्ठ ….!!!विधायक.. के अमर्यादित कथन या इससे जुड़ी खबरें पढ़ी या सुनी होगी..दुष्कर्म को लेकर उक्त कथन में आपको कहीं भी वरिष्ठता की गरिमा महसूस ..नहीं हुई होगी तो छोड़िए वरिष्ठता को…उन विधायक महोदय के अमर्यादित बिगड़े बोल सुन कर तो …तो सदन की दीवारें भी एक क्षण के लिए स्तब्ध हो गई होगी …सदन की चारदीवारियों को लगा होगा कि..इस विधानसभा ..सदन में बैठे दूसरे लोगों के बीच भी विधायक के इस कथन से सन्नाटा छा जाएगा..पर यह क्या प्रजा तंत्र के उस मंदिर में भी ..अमर्यादित बयान पर हतप्रभ होने के बजाय ठहाके गूंज गए..ऐसे में सदन की चारदीवारियों में तो मौजूद प्रजातन्त्र की रूहें भी कांप गई होगी सदन को गुस्सा भो आया होगा..तो क्या संभव है अगर वह सशरीर प्रतिक्रिया कर पाता तो .. थप्पड़ों से सदन गूंज गया होता..या फिर सदन की दीवारें कहती कि नहीं –यह बिलकुल भी ठीक नहीं है..पर यहां तो सुविधा है सुविधाओं का खेल है ..कुछ भी कह लो और कुछ भी कर लो फिर माफी मांग लो..(जारी)

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