यहां नागराज की पूजा मानव रूप के साथ नदी के रूप में भी की जाती है।

जशपुर नगर। नाग पंचमी के अवसर पर देश भर में नागदेव की पूजा करने की अलग अलग परम्परा है। मान्यता है कि आज के ही दिन नागदेव धरती पर अवतरित हुए थे। जशपुर शहर के समीप स्थित ग्राम सिटोंगा में इस दिन विशेष नाग दरबार सजता है। यहां नाग देव की पूजा मानव रूप के साथ नदी के रूप में भी की जाती है। यह विशेष नाग दरबार बांकी और श्री नदी के उद्गम स्थल पर लगता है। नागदेव की पूजा के लिए दूर दराज से श्रद्धालु हाथों में दूध का लोटा और पूजा की थाल लेकर आते हैं।। मान्यता है कि आज के दिन नागदेव,भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं।
सिटोंगा में खेतो के बीच एक छोटा सा नागदेव मंदिर भी स्थित है। यहां स्थापित नाग और नागिन की प्रतिमा,भाई बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक है। यहां स्थित एक छोटे से कुंड से नाग देव श्री और बहन बांकी नदी के रूप में प्रवाहित हो कर,न केवल जिले वासियों की प्यास बुझा रहे हैं,बल्कि अनाज का भंडार भी भर रहे हैं। मान्यता है कि बांकी और श्री,नामक भाई बहन ने अनजाने में खेत मे पड़े हुए सांप के अंडे को खा कर,नाग रूप में परिवर्तित हो गए थे। भाई,श्री जशपुर से कुनकुरी की ओर चले गए और बहन बांकी ने जशपुर से नीमगांव की राह पकड़ी। जिस स्थल में भाई बहन ने नाग रूप धारण किया,वही से बांकी और श्री नदी का उद्गम हुआ और वे भाई बहन के साथ प्रवाहित होने लगे। माना जाता है कि अपने भक्तों के शरीर मे प्रवेश कर,बांकी और श्री,नाग पंचमी के दिन दर्शन देते हैं।
नदी को पुनर्जीवित करने चल रहा है जन आंदोलन
जशपुर शहर की जीवन रेखा बांकी नदी को उसका पुराना गौरव वापस दिलाने के लिए इनदिनों जशपुर की जनता ने श्रमदान का अनोखा आंदोलन चलाया है। अतिक्रमण और उपेक्षा से सिमट रहे बांकी नदी को बचाने के साथ ही तट के सुंदरीकरण के लिए लोग श्रम और आर्थिक रूप से सहयोग कर रहे हैं। कलेक्टर रितेश अग्रवाल ने इस पूरे जन सहयोग को आवे बढाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बांकी नदी की सफाई का काम पूरा हो चुका है। सुंदरीकरण का काम अंतिम चरण में हैं। भेंट मुलाकात कार्यक्रम में जशपुर के प्रवास पर आए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी इससे बहुत प्रभावित हुए थे। आइए,नाग पंचमी के पुनीत अवसर पर हम सब नागदेव के पवित्र उपहार बांकी नदी के पुनर्जीवन के अभियान को आगे बढाने का संकल्प लें।



