नेतागिरी छोड़ दोबारा कलेक्टर बन सकते हैं OP चौधरी?

 

रायपुर:छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद पहले ऐसे IAS जिन्होंने हिन्दी माध्यम में देश का सर्वोच्च पद हासिल किया, नाम है ओपी चौधरी. वर्तमान समय में उन्हें सर्वोच्च पद हासिल करने वाला आम आदमी कहा जाए तो गलत नहीं होगा.

 

मौका था छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव, साल- 2018 और तारीख- 29 अगस्त जब 2005 बैच के IAS अफसर ओमप्रकाश चौधरी ने अमित शाह के समक्ष भाजपा का दामन थाम लिया था. उन्होंने 16 अगस्त को केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय को अपना इस्तीफा भेजा जिसे 24 अगस्त को मंत्रालय ने स्वीकार भी कर लिया था. OP चौधरी का यह फैसला कई मायनों में सवालों से भरा रहा.

 

राजनीतिक पृष्ठभूमि में चौधरी के भाजपा मोह के कई मायने निकाले गए, लेकिन उनका अपना मानना था कि IAS की नौकरी में आने के बाद लोगों के लिए जितना कर सकते थे उन्होंने किया. मगर एक समय के बाद वह खुद को बंधा हुआ महसूस करने लगे और इसलिए उन्होंने राजनीति में आने का फैसला लिया. लोग भले ही उनके इस दलील को बेतुका करार दें, लेकिन चौधरी को इससे कभी फर्क नहीं पड़ा.

खरसिया में उमेश की आंधी

भाजपा में एंट्री के बाद ओपी चौधरी अब IAS से BJP नेता बन गए थे. 2018 विधानसभा चुनाव में उन्होंने खरसिया विधानसभा से चुनाव लड़ा, लेकिन उमेश पटेल की आंधी ने उनके पैर जमने ही नहीं दिए. भाजपा नेताओं के दावे धरे के धरे रह गए. प्रदेश में उमेश पटेल की जीत से ज्यादा ओपी चौधरी के हार के चर्चे थे. खरसिया की जनता ने उन सभी अटकलों पर पानी फेर दिया था जो ओपी चौधरी के पक्ष में लग रहे थे. क्षेत्र में तो कांग्रेस शुरू से ही विजयरथ पर सवार है.

क्या फिर IAS की नौकरी कर सकते हैं OP?

विधानसभा चुनाव हारने के बाद पूरे प्रदेश में चर्चा थी कि ओपी चौधरी की राजनीतिक पारी शुरू हुई ही नहीं थी और खत्म हो गई. तब वो दौर था जब राजनीतिक मुद्दों में कुछ खास रूचि नहीं रख रहे युवा भी इस विषय पर दिलचस्पी दिखा रहे थे.

एक सवाल भी सभी के मन में था कि अब चुनाव हारने के बाद क्या ओपी चौधरी दोबारा कलेक्टर की चेयर पर नजर आएंगे? क्या सिस्टम में कोई ऐसा प्रावधान या प्रक्रिया है जिससे ओपी चौधरी दोबारा अपना पद हासिल कर सकें.

अब तो काफी देर हो गई

जानकारों का कहना है कि ओपी चौधरी के पास अब कोई चारा नहीं है. केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय ने उनका इस्तीफा यदि स्वीकार न किया होता तो एक बारगी उनके पास वापस प्रशासन सेवा में जानें का मौका था. जानकारों का यह भी मानना है कि देर तो तभी हो गई थी, जब भाजपा की सदस्यता लेने के बाद 30 दिन गुजर गए.

यानी राजनीति में प्रवेश करने के बाद उनके पास महज 30 दिन थे. इस एक महीने के भीतर अगर वो चाहते तो अपने फैसले पर विचार-विमर्श कर दोबारा जिम्मेदारी संभाल सकते थे, लेकिन अब वो ऐसा नहीं कर सकते. फिर भी वो चाहें तो IAS बन सकते हैं, लेकिन उन्हें दोबारा एग्जाम क्लीयर करना होगा. मगर इसके लिए वह उम्र की सीमा से काफी दूर निकल चुके हैं।

क्या कहते हैं ओपी चौधरी?

राजनीति के लिए ओपी चौधरी ने अपनी 12 साल की सर्विस एक झटके में छोड़ दी. दिलचस्प है यह जानना कि इस सवाल पर खुद ओपी चौधरी का क्या रिएक्शन रहेगा. वैसे सवाल के जवाब में उनका हंसते हुए “बिल्कुल नहीं” कहना, कहीं न कहीं उनके मन के भीतर छिपे उस पछतावे को जरूर दर्शाया.

दबी जुबान से उन्होंने यह तो साबित कर ही दिया कि उन्हें कलेक्टर की चेयर और उस दफ्तर की याद आ रही है, हालांकि उन्होंने इस बात से साफ इनकार किया है. मगर इतना जरूर है कि ओपी चौधरी भाजपा नेता हो या पूर्व IAS, युवाओं के प्रेरणाश्रोत अब भी हैं.

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